लोकल. तेज. भरोसेमंद खबरें इट्स बैतूल टाइम्स | बैतूल जिले की ताजा अपडेट
--:--:--
ताज़ा खबर बैतूल समाचार जिले और आसपास की सबसे तेज व सत्यापित अपडेट

तुलसी विवाह की कथा | Tulsi Vivah ki Katha | तुलसी विवाह की कहानी

तुलसी विवाह की कथा

तुलसी विवाह की कथा | Tulsi Vivah ki Katha | तुलसी विवाह की कहानी 

सभी को मेरा नमस्कार आज मैं आप सभी के समक्ष तुलसी विवाह ( Tulsi Vivah ) की तो कथाएं प्रस्तुत कर रही हो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह कराया जाता है और इसी तिथि के बाद शादी विवाह आदि शुभ कार्य आरंभ किए जाते हैं जिन परिवारों में पुत्री नहीं होती वह तुलसी जी का शादी सालीग्राम जी के साथ विवाह करवा कर कन्यादान का फल प्राप्त करते हैं और जो स्त्रियां कार्तिक मास का स्नान करते हैं वह तुलसी जी तथा शालिग्राम का विवाह भी करती हैं तुलसी जी के विवाह को पूरे विधि विधान से खूब गाजे-बाजे के साथ किया जाता है तुलसी जी और शालिग्राम के फेरे एक सुंदर मंडप में करवाए जाते हैं आइए शुरू करते हैं तुलसी जी के विवाह की एक लोक कथा एक परी वार में एक ननंद सच्चे मन से तुलसी मां की विशेष पूजा करती थी लेकिन उसकी भाभी को यह सब पसंद नहीं था वह अक्सर ही गुस्से में अपनी ननद को कोसते हुए कहती थी कि दहेज में वह अपनी ननद को तुलसी ही देगी यही नहीं वह बारातियों को भी खाने के लिए तुलसी ही भरोसे ही समय का चक्र बड़ा बलवान है आखिर ननंद के विवाह की घड़ी भी आ गई भाभी ने बारातियों के सामने तुलसी का गमला फोड़ कर रख दिया भगवान श्री हरि की कृपा से अजीज व्यंजनों में बदल गया भाभी को यह रास नहीं आया उन्होंने ननंद के गहनों की जगह तुलसी की मंजरी पहना दी क्षण भर में वह मंजरी सोने के आभूषणों में बदल गई इसके बाद भाभी ने वस्त्रों की जगह जनेऊ रख दिया और वह जनेऊ भी रेशमी वस्त्रों में बदल गया जब उसकी ननद अपने ससुराल में पहुंची तो वहां पर उसकी बहुत बढ़ाई हुई उसके बाद भाभी को भी तुलसी पूजा का महत्व समझ आ गया कहते हैं यदि आपके मन में श्रद्धा नहीं है तो पूजा करने से फल फूल चढ़ाने से या स्वादिष्ट व्यंजन बनाने से कोई लाभ नहीं मिलता लेकिन अगर मन में श्रद्धा और विश्वास हो तो एक फूल भी बहुत कुछ होता है उसके बाद भाभी ने अपनी बेटी को भी तुलसी जी की पूजा करने के लिए कहा परंतु उसकी बेटी ने उसकी एक न सुनी जब उसकी बेटी के विवाह का समय आया तो उसने सोचा कि वह अपनी बेटी के साथ वही व्यवहार करेगी जो उसने अपनी ननद के साथ किया था तो तुलसी मां उसकी बेटी को भी आशीर्वाद देंगे यह सोचकर भाभी ने अपनी बेटी के विवाह में वही सब किया लेकिन तुलसी का गमला टूटा टूटा ही रहा और मंजरी सोने के आभूषण बनने की बजाय मंजरी ही रही और जनेऊ हीरा समाज में बेटी और उसके परिवार जनों की बहुत निंदा हुई और सभी को खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी इतना सब कुछ होने के बाद भी भाभी ने कभी अपनी ननद को घर पर नहीं बुलाया एक दिन भाई ने सोचा क्यों ना वही अपनी बहन से मिलने चला जाए उसने अपनी पत्नी से अपने मन की बात कही और कुछ उपहार स्वरूप ले जाने के लिए कहा इस पर भाभी ने उसे छोले में ज्वार रखकर दे दिया भाई को बहुत दुख हुआ उसने सोचा कि बहन के घर ज्वार ले कर कैसे जाए तब उसने रास्ते में एक गोशाला में गाय के सामने झोला पलट दिया मां तुलसी की कृपा से सारा ज्वार बहुत ही सुंदर सुंदर उपहारों तथा सोने-चांदी के आभूषणों में बदल गया तब गोपालक ने कहा कि वह सोना चांदी तथा उपहार गाय को क्यों दे रहा है तब भाई ने देखा और उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा उसने गोपालन को सारी बात बताई तब गोपालक बोला यह सब तुलसी मां की कृपा है भाई भी खुशी खुशी अपनी बहन के घर गया उसके द्वारा लाए हुए उपहार देखकर उसकी बहन तथा ससुराल वाले बहुत खुश हुए हे तुलसी मैया जैसे आपने ननद पर कृपा की उसी प्रकार अपनी कृपा सब पर बनाए रखना जय मां तुलसी इस प्रकार तुलसी विवाह की लोक कथा पूर्ण हुई